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बेटी को बनाना था जज इसीलिए किसान पिता ने बेच दी जमीन, बेटी ने जज बनके कर दिए पापा के सपने पूरे

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एक बेटी ने सच कर दिखाया अपने पिता के सपनों ने। सच ही कहा है किसी ने जिस के पास हौसला है उसे मंज़िल मिल ही जाती है। एक किसान की बेटी स्मृति मुफलिसी ने सिविल जज बनकर न केवल अपने पिता के सपने को पूरा किया है बल्कि युवाओं के लिए एक मिसाल भी कायम की है।

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स्मृति ने आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद सिविल जज बनकर लाखों लड़कियों के लिए एक रोल मॉडल का काम किया है। उन्होंने युवाओं को बताया है कि अगर मन में कुछ पाने की चाहत हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है, बस लगन और हौसला होना चाहिए। हिम्मत और लगन के आगे तो पहाड़ के समान मुसीबतें भी घुटने टेकने को मजबूर हो जाती हैं।स्मृति की सिविल जज बनने तक की कहानी-

स्मृति रीवा जिले के खजुहा गांव की रहने वाली हैं। उनके पिता का नाम है लोकनाथ पटेल। वो एक किसान हैं और उनके चार बच्चे हैं। स्मृति उनकी दूसरे नंबर की बेटी हैं। स्मृति ने बताया कि, ‘चौथी तक रीवा में रहकर अंग्रेजी मीडियम से पढ़ाई की। आर्थिक स्थित ठीक नहीं होने पर पिता जी सभी को लेकर गांव चले गए। पांचवीं की पढ़ाई गांव के ही इजीएस स्कूल में शुरू की तो लोग ताने मारने लगे। छठवीं कक्षा में पढऩे के लिए फिर शहर आ गए।

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रेवांचल पब्लिक स्कूल ने आंग्रेजी मीडियम के बजाए हिंदी मीडियम में नाम लिखा। सातवीं तक हिंदी मीडियम की पढ़ाई के बाद। पढ़ाई के लिए पिता ने चार एकड़ जमीन बेची और भाइयो का भी एडमीशन अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाने लगे। भाई अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई कर रहे थे तो मैने भी जिद किया तो नवीं से बारहवीं तक अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई की ओर कामन लॉ एडमीशन टेस्ट की तैयारी की। कुछ घरेलू कारण से टेस्ट में शामिल नहीं हो सकी। अहिल्या विवि इंदौर में टेस्ट में बैठे तो पहली रैंक आयी। वर्ष 2010 से लेकर 2015 तक बीए-एलएलबी की पढ़ाई की। 86 प्रतिशत रिजल्ट आया। वर्ष 2016 में नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट भोपाल से एलएलएम उत्र्तीण किया। वर्ष 2017-18 की न्यायिक सेवा की परीक्षा पास की। पिता की आर्थिक संकट को देखने के बाद कई बार विचार बदले लेकिन, जब उनके सपने को पूरा करने के कड़ी मेहनत की और सफलता मिली। स्मृति 24 दिसंबर 2018 को सिविल जज के तौर पर सागर में कार्यरत हैं।

स्मृति के पिता लोकनाथ पटेल ने इंटरव्यू के दौरान बताया कि, ‘उन्होंने मुफलिसी में भी बच्चों के जज्बे को कमजोर नहीं होने दिया। कई बार संकट आया फिर भी हार नहीं माने। बेटी स्मृति को छुट्यिों के दौरान कलेक्टर, एसपी और जजों के बंगले दिखाने के लिए ले जाते थे और कहते थे कि बिटिया इस तरह के मकान बनवाना मेरे बस का नहीं। ये बंगले सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई से मिल सकते हैं। बच्चों को पढ़ाने के लिए जमीन बेची और गांव का ताना सहने के बाद ही हार नहीं माने।

बेटी सिविल जज बनने में सफल रही और बेटा धर्मेन्द्र इंजीनियर बन गया। बेटी की देखी सीखा बेटा धनेन्द्र भी इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट की प्रवेश परीक्षा पास कर पढ़ाई कर रहा है। बेटी आकृति पटेल भी पढ़ाई कर रही है और पत्नी चन्द्रकला पटेल आंगनवाड़ी कार्यकर्ता है।’

स्मृति सभी युवाओं के लिए एक मिसाल है। उन्होंने गांव में रहने वाले सभी युवाओं को ये बताया है कि गांव में रहकर भी कुछ हासिल किया जा सकता है। गांव में पैदा होने से आपका मकसद किसानी और मजदूरी नहीं होनी चाहिए। आपको संवेदनशील होना चाहिए और लक्ष्य के प्रति जागरूक और सचेत रहना चाहिए।

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