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सरकार और बैंकिंग सूत्रों के अनुसार बड़े सुधार के तहत पीएसयू बैंकों की संख्या आधी से कम किए जाने की स्कीम है। अभी देश में 12 सरकारी बैंक हैं और इस संख्या को 4-5 तक सीमित करने की मंशा बना रही है। अच्छे प्रदर्शन नहीं कर पा रहे सरकारी बैंकों में हिस्सेदारी बेचने के लिए नए निजीकरण प्रस्ताव पर काम चल रहा है। कैबिनेट की मंजूरी के बाद यह प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। कोरोना से अर्थव्यवस्था पर बहुत दबाव है और सरकार के पास फंड की कमी हो गई है। ऐसे में नॉन कोर कंपनियों और क्षेत्रों का निजीकरण कर बड़ी पूंजी जुटाने में मदद मिल सकती है। कई सरकारी समितियों और रिजर्व बैंक ने भी सिफारिश की थी कि 5 से अधिक सार्वजनिक बैंक नहीं होने चाहिए।

एक अधिकारी के अनुसार पहले चरण में बैंक ऑफ इंडिया, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक, यूको बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और पंजाब एवं सिंध बैंक का निजीकरण होगा। उन्होंने बताया, सरकार ने पहले ही बता दिया है कि अब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय नहीं होगा। लिहाजा केवल उनके निजीकरण का ही विकल्प बचता है। पिछले साल ही 10 सरकारी बैंकों का विलय कर 4 बड़े बैंक बनाए गए थे। अब अगली तैयारी जिन बैंकों का विलय नहीं हुआ है, उनके निजीकरण पर चल रही है।

अधिकारी ने कहा कि बैंकों के निजीकरण के रास्ते में बैड लोन बाधा बन सकते हैं। महामारी के कारण चालू वित्तवर्ष में बैड लोन का दबाव दोगुना तक बढ़ने का अनुमान है। लिहाजा इस प्रक्रिया की शुरुआत अगले वित्तवर्ष में होगी। आरबीआई के मुताबिक, सितंबर 2019 तक सरकारी बैंकों पर 9.35 लाख करोड़ का बैड लोन था, जो उनकी कुल संपत्ति का 9.1 फीसदी ही है। ऐसे में हो सकता है कि इस साल सरकार को ही इन बैंकों की वित्तीय हालत सुधारने के लिए 20 अरब डॉलर (करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये) डालने पड़ सकते हैं।

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