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कथाओं के अनुसार, भगवान शिव से मिलने जब भी कोई कैलश पर्वत आता है तो उसे सबसे पहले उसे नंदी से ही शिव जी से अनुमित लेने पड़ती थी। ऐसा इसलिए होता था क्योंकि भगवान भोले हमेशा समाधि और तपस्या में लीन रहते थे ऐसे में उनकी तपस्या को विघ्न न पड़े इसकिये नंदी ही हमेशा पहरेदारी करते थे।

जब भी कोई शिव से मिलने आता था तो पहले नंदी ही शिव के पास जाकर अनुमति लेते थी कि, शिव उनसे मिलेंगे या नहीं। वहीं बात आज भी कही जाती है कि, किसी भी भक्त की बात शिव तक सिर्फ नंदी ही पहुंचा सकते हैं। इसलिए भक्त अपनी हर मनोकामना नंदी के कानों में ही कहते हैं। नंदी को शिव का अवतार भी माना जाता है। कथा के अनुसार शिलाद नाम के एक मुनि हुआ करते थे, जो कि ब्रह्मचारी थे। भगवान का अवतार भी नंदी को माना जाता है।

कथा में बताया गया है कि, शिलाद नाम के ब्रह्मचारी एक मुनि हुए करते थे। जिन्हे उनके पितरों द्वारा वंश समाप्त होने के डर से संतान करने के लिए बोला। इसके बाद मुनि शिलाद ने भोलेनाथ की तपस्या की और अयोनिज और मृत्युहीन पुत्र की मांग की। जिसके बाद भगवान शिव ने उन्हें मुँह मांगा वरदान दिया। जिसके बाद एक दिन मुनि भूमि जोट रहे थे उस दौरान उन्हें एक बच्चा मिला।

जिसका नाम उन्होंने नंदी रखा। मुनि को बाद में पता चला कि, नंदी तो काफी कम उम्र ही जीवित रहेगा जिसके बाद नंदी ने भोलेनाथ की आराधना की और शिव ने उन्हें दर्शन दिए। तब शिव ने उन्हें बताया कि, वो शिव के ही अंश हैं उन्हें मृत्यु से डरने की जरूरत है। जिसके बाद नंदी शिव के साथ रहने की इच्छा जाहिर की तो शिव ने नंदी की इस इच्छा को स्वीकार कर लिया।

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