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किन्नर को हमेशा समाज से अलग समझा गया, लेकिन लोगों की यह सोच अब धीरे—धीरे बदल रही है। वर्ष 2014 में चुनाव के दौरान किन्नरों का अलग जेंडर तय हो गया। इससे ये समाज के लिए उतने महत्वपूर्ण हैं, जितना हम सभी है। किन्नरों से रूबरू होने के लिए अगर हम उनके बीच जाते हैं तो उनके वास्तविक जीवन के कई रोचक तथ्य बरबस हमारे सामने आ जाते हैं। शहर की एक निजी संस्था ने किन्नरों के बारे में एक सर्वेक्षण कराया है, जिसमें कई रोचक जानकारियां सामने आई हैं। इसमें सबसे रोचक जानकारी यह है कि उत्तर प्रदेश में हर वर्ष किन्नरों की संख्या 3 हजार के करीब बढ़ रही है।

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक यूपी में किन्नरों की संख्या 137465 थी, जो मौजूदा समय में लगभग 164615 हो गई है। कुल मिलाकर 10 वर्षों में 27150 की वृद्धि हुई है। वहीं प्रदेश में सबसे ज्यादा किन्नरों की 14915 संख्या आगरा मंडल में है। बनारस मण्डल में 12620, मुरादाबाद मंडल में 9790 और प्रयागराज मंडल में 8808 किन्नर हैं। संस्था ने इन आंकड़ों को प्रदेश के 20 जिलों में 293 किन्नरों से संपर्क करके तैयार किया है। यह सर्वेक्षण अबुल कलाम जन सेवा संस्थान के सचिव नाजिम अंसारी और नई दिल्ली की संस्था इंडो ग्लोबल सोशल सोसायटी की ओर से कराया गया है।

सर्वेक्षण को अगर धर्म के आधार पर देखा जाए तो सबसे ज्यादा किन्नर हिंदू धर्म से है जो 74 प्रतिशत है, 25 प्रतिशत मुस्लिम वर्ग और एक प्रतिशत सिख धर्म से है। वहीं पढ़ाई के मामले में 27 प्रतिशत किन्नर कक्षा एक से 9 तक, 4 प्रतिशत 10 वीं, 3 प्रतिशत 12 वीं और 2 प्रतिशत ही स्नातक हैं।  सर्वेक्षण के मुताबिक 3-10 वर्ष की उम्र में 29 प्रतिशत, 11-15 की उम्र में 40 प्रतिशत और 16-22 की उम्र में 30 प्रतिशत किन्नर अपना घर छोड़ देते हैं। वहीं 57 प्रतिशत लोग किन्नरों को गलत नामों से बुलाते हैं। वहीं 64 प्रतिशत पुलिसवाले इन्हें परेशान करते हैं। अबुल कलाम आजाद जनसेवा संस्थान के सचिव नाजिम अंसारी कहते हैं कि किन्नरों के जीवन में खुशहाली लाने के लिए सरकार से किन्नर वेलफेयर बोर्ड बनाने के मांग की गई है।

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