मनीष ने इस हदयविदारक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि, ‘जब मुझे घर से फोन आया तो मैं बेचैन हो गया। मैं फौरन अस्पताल से जा भी नहीं सकता था। परिवार के लोग मेरे बेटे को किंग जॉर्ज मेडिकल यूनीवर्सिटी (केजीएमयू) ले गये। मुझे दिलासा देने के लिये वे व्हाट्सऐप पर हर्षित की फोटो भेजते रहे। रात करीब दो बजे वह दुनिया को छोड़ गया। मनीष बिलखते हुए कहते हैं कि जब मुझे अपने बेटे के निधन के बारे में जानकारी मिली, तो उस वक्त मैं  कोरोना मरीजों की देखरेख में लगा हुआ था  और मैंंने अपने साथी कर्मियों को बताया कि इन्हें छोड़कर नहीं जा सकता।

मनीष अपना दर्द बयां करते कहते हैं कि जब मेरे परिवार वाले मेरे बेटे हर्षित का शव लेकर आए तो मैं अपने आप पर काबू नहीं कर पा रहा था। मैं उसके पास जाकर रोना चाहता था। उसके पास जाकर अपनी संवेदनाओं को प्रकट करना चाहता था, लेकिन मैं मजबूर था। मैं अपने बेटे को गले लगाना चाहता था। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वो अब  इस दुनिया में नहीं रहा। इस दौरान वे न महज अपने बेटे से दूर रहे बल्कि कोरोना संक्रमण के डर से अपने परिवार से भी दूर रहे  हैं।

उनके पास जाने से भी डर रहे थे। उन्हें डर लग रहा था कि उनकी एक गलती उनके पूरे परिवार पर भारी पड़ सकती थी, इसलिए उन्होंने किसी प्रकार की कोई जोखिम लेना मुनासिब न समझा। मनीष रोते हुए कहते हैं कि मैं अंतिम संस्कार के दौरान अपने बेटे को छू तक नहीं पाया, क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि कहीं यह संक्रमण उनके परिवार में न फैल जाए। फिलहाल तो वे अपने परिवार से दूर हैं। उन्होंने बताया कि वे अपने मोबाइल से अपने बेटे के कुछ पुराने तस्वीरों और वीडियो को देख रहे थे।

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