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आगरा के खंदौली क्षेत्र में रहने वाले चाँद बाबू की फैक्ट्री में जब उत्तर प्रदेश की पुलिस ने छापा मारा तो वह दंग रह गए. देसी घी बनाने वाली फैक्ट्री में जानवरों की चर्बी, सींग, खुर और हड्डियों का इस्तेमाल हो रहा था. देसी घी बनाने के लिए यह लोग कत्लखानों से जानवरों की चर्बी, सींग, खुर और हड्डियां ले आते थे.

फिर यह एक बड़े बर्तन में डालकर जानवरों की चर्बी, सींग, खुर और हड्डियों को उबालते थे. बहुत ज्यादा उबालने के बाद जानवरों की चर्बी, सींग, खुर और हड्डियों से चर्बी निकल कर पानी के ऊपर तैरने लगती थी जो की देसी घी के रूप में बाजार में बेची जाती थी. कम लागत में ज्यादा कमाई करने वाले चाँद बाबू समेत 4 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया जबकि दो लोग भागने में कामयाब रहे.

मौके पर पुलिस ने इसी तरह से बनाया हुआ 100 किलोग्राम देसी घी पर जब्त कर लिया. खाद्य सुरक्षा विभाग को शिकायत मिली थी की इस फैक्ट्री में रोज़ाना भारी मात्रा में जानवरों की चर्बी, सींग, खुर और हड्डियों को लाया जाता हैं, जबकि यह फैक्ट्री देसी घी बनाने की हैं. खाद्य सुरक्षा विभाग ने पुलिस के साथ मिलकर इस फैक्ट्री में छापा मार दिया और नकली देसी घी के व्यापार का भांडा फोड़ दिया.

सभी आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 272-273 (विक्रय के लिए खाद्य या पेय वस्तु का अपमिश्रण) और खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 की धारा 26 (असुरक्षित-संदूषित-अवमानक खाद्य) के तहत केस दर्ज़ किये गए और इनमे पकडे गए आरोपियों के नाम चाँद बाबू, शेफी, इकबाल और ताहिर हैं. जबकि दो आरोपी फरार हैं जिनके नाम शल्लो और शोहिल हैं.

आरोपियों का कहना है की हमें इस तरह से देशी घी बनाने के लिए मात्र 23 रूपए प्रति किलो का खर्च आता था. दुकानदार भी हमसे इसी देसी घी की मांग करते हैं और हम उन्हें 60 रूपए प्रति किलो के हिसाब से बेचते हैं. दुकानदार को पता होता है की देसी घी कैसे बना और वह भी आगे इसे 200-350 रूपए किलो तक बेच देता हैं. उत्पादन की बात करें तो इस फैक्ट्री में रोज़ाना 200 से 250 किलोग्राम देसी घी बनता जो आस पास के शहरों तक बेचा जाता था.

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