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वैज्ञानिकों के अनुसार, चुंबकीय क्षेत्र के चलते कवच में दरार तो बन ही रही है। धरती के उत्तरी हिस्से से यह कमजोर चुंबकीय क्षेत्र पूरे आर्कटिक की तरफ फैल गया है। मई में यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने रिपोर्ट दी थी कि बीते 200 बरसों में चुंबकीय क्षेत्र ने औसतन अपनी 9 फीसदी क्षमता गंवा दी थी। 1970 से ही कवच में क्षति की प्रक्रिया में तेजी आई और यह 8 फीसदी कमजोर हो चुका है। कवच के दो टुकड़ों में बंटने को अभी साबित नहीं किया जा सकता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार धरती के अंदर पैदा हो रही इस गड़बड़ी का असर धरती की सतह तक हो रहा है। खासकर धरती के नजदीकी वातावरण पर इसका गहरा कुप्रभाव पड़ेगा, जो सैटेलाइट मिशनों के लिए घर है। कहा जा रहा है कि यदि ऐसा हुआ तो दुनिया भर के सैटेलाइट मिशनों को एक और बड़ी चुनौती का सामना करना होगा।

असल में, जब भी कोई सैटेलाइट इन प्रभावित इलाकों से होकर गुजरेगा तो उसे सूरज से निकलने वाली उच्च ऊर्जा वाले प्रोटॉन कणों की बौछार का सामना करना पड़ सकता है। वह भी उस समय, जब उस इलाके का चुंबकीय क्षेत्र अपनी ताकत का पूरा प्रयोग नहीं कर पाता है। ऐसे में सैटेलाइट के कंप्यूटर खराब हो सकते हैं या फिर खराब हो सकते हैं।

नासा के अनुसार, अपने सैटेलाइट को बचाने के लिए अधिकतर अंतरिक्ष एजेंसियां खास जुगाड़ का प्रयोग कर रही हैं। जब कमजोर चुंबकीय क्षेत्र वाले इलाकों से सैटेलाइट गुजरते हैं तो वे अपने सैटेलाइट की पावर को कम कर देते हैं। ऐसा करके सूरज की खतरनाक विकिरणों से वे अपने सैटेलाइट को खराब होने से बचाया जा सकता है।

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