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वैदिक ज्योतिष में कई तरह के दोषो के बारे में बताया गया है | कुंडली में किसी भी प्रकार का दोष उत्पन्न होने पर व्यक्ति के जीवन में परेशानियां उत्पन्न होने लगती है | ये दोष व्यक्ति के जीवन में आ रही परेशानी का बड़ा कारण होते है | ज्योतिष में एक ऐसा ही दोष बताया गया है त्रिखल दोष | ये दोष दो प्रकार का होता है, पहला ये कुंडली में बनता है, जबकि दूसरा दोष जन्म के अनुसार लगता है |
कुंडली में लगने वाला त्रिखल दोष
 
 
ये दोष तब उत्पन्न होता है, जब कुंडली में एक ही ग्रह तीन परिस्थितिओ में अपने कारक भाव में बैठ जाये | जब किसी व्यक्ति का जन्म सूर्य कृतिका, उत्तराषाढ़ या उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में हो और सूर्य पहले या दसवे भाव में मौजूद हो | तब ऐसी स्थिति में जातक की कुंडली में त्रिखल दोष उत्पन्न हो जाता है | ऐसा इसलिए क्योंकि इन नक्षत्रो का स्वामी सूर्य है और कुंडली के प्रथम और दशम भाव का कारक भी सूर्य है | इस सूर्य तीनो कारक भाव में है |
जन्म त्रिखल दोष
 
 
ज्योतिष के अनुसार जन्म के समय त्रिखल दोष तब उत्पन्न होता है, जब तीन संतान पर कोई संतान जन्मी हो | अर्थात तीन पुत्रो के बाद पुत्री का जन्म या तीन पुत्रियों के बाद पुत्र का जन्म | ये त्रिखल दोष को उत्पन्न करता है |
त्रिखल दोष का प्रभाव
 
 
ज्योतिष में बताया गया है कि त्रिखल दोष तीन सन्तानो पर पैदा होने वाली संतान जैसे 3 पुत्रो के बाद जन्म लेने वाली पुत्री या 3 पुत्रियों के बाद जन्म लेने वाले पुत्र को लगता है | ऐसा बताया जाता है कि इस दोष से संतान को मृत्यु तुल्य कष्ट सहना पड़ता है | उसका जीवन कष्टों से घिरा रहता है | उसे कोई ना कोई रोग घेरे रहता है |
त्रिखला दोष से निवारण
ज्योतिष के अनुसार जन्म के बाद अशौच के दिन निकल जाने के बाद किसी भी शुभ मुहूर्त में त्रिखला दोष का निवारण किया जा सकता है | त्रिखला दोष से मुक्ति पाने के लिए धान की ढेरी पर चार कलश स्थापित कर | त्रिदेव और इंद्रदेव की पूजा करनी चाहिए | साथ ही शांति सूक्त और रूद्र सूक्त का पाठ कर हवन करवाना चाहिए |

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