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सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी बालिग महिला को उसकी मर्ज़ी के बिना लंबे वक़्त तक सुधारगृह में नहीं रखा जा सकता है। जस्टिस पृथ्वीराज चव्हाण ने सुनवाई के दौरान कहा कि अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम 1956 (Immoral Trade Prevention Act) का मकसद देह व्यापार को समाप्त करना नहीं है। इस कानून में तो ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है। जो वेश्यावृत्ति (Prostitution) को खुद में अपराध मानता हो या फिर देह व्यापार से जुड़े हुए लोगों को दंड देता हो। इस कानून में तो सिर्फ किसी व्यवसायिक मकसद के लिए यौन शोषण करना या फिर किसी पब्लिक प्लेस में अशोभनीय हरकत करने को दंडित माना गया है।

जस्टिस पृथ्वीराज चव्हाण ने यह भी साफ कहा कि, हर एक व्यक्ति को संविधान के तहत एक स्थान से किसी दूसरे स्थान जाने, अपनी पसंद के स्थान पर रहने का अधिकार है। इसके बाद उन्होंने वेश्यावृत्ति से छुड़ाई गई लड़कियों को सुधारगृह से छोड़ने का आदेश दिया। इन तीनों लड़कियों को वर्ष 2019 में मुंबई पुलिस ने छुड़वाया था, जिसके बाद इन्हे सुधारगृह भेज दिया गया था। कोर्ट ने इन्हे उत्तर प्रदेश प्रशिक्षण के लिए भेजने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने इस युवतियों को इनकी परिवार वालों को भी सौंपने से साफ़ इंकार कर दिया है।

निचली अदालत ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि उसके सामने जो तथ्य आये उसमे तीनों लड़कियां एक ऐसे समुदाय से थीं जहां देह व्यापार करना एक परंपरा है। इस फैसले के खिलाफ ही हाई कोर्ट ने सुनवाई के लिए याचिका दी गई थी, जिसमे कोर्ट ने सभी पक्षों को सुना और कहा कि लड़कियां बालिग हैं और अपनी पसंद की जगह जगह रहने और अपनी पसंद करने का अधिकार उन्हें हैं। कोर्ट निचली अदालत के भी आदेश को निरस्त कर दिया। इसके बाद उन लड़कियों को सुधारगृह से मुक्त करने का आदेश दिया।

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