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सुनीता यादव का साल 2011 में पुलिस सिपाही के पद पर चयन हुआ था और साल 2013 में उन्हें कैंसर के बारे में पता चला। उनके जन्म से लेकर उनके जिंदगी के अब तक के सफर में उन्होंने कई उतार-चढ़ाव का सामना किया। इसकी शुरुआत तब हुई जब वह महज 3 साल की थी। हाल ही में उन्होंने अपने संघर्षमय जीवन कहानी को Humans of Bombay के साथ साझा किया है। इस दौरान उन्होंने बताया कि जब मैं महज 3 साल की थी तब मेरी शादी पास के गांव के एक लड़के से हो गई। उन दिनों राजस्थान में बाल विवाह का चलन था, लेकिन मेरा गोना 18 साल की उम्र में हुआ। मेरी जिंदगी का नया अध्याय शादी के साथ शुरू हुआ।

जब मेरी शादी हुई तब मैं इस लायक नहीं थी कि शादी का मतलब समझ सकती। मुझे केवल पढ़ाई की चिंता सताती थी। जब मैं 5 साल की थी तब मेरे गांव में एक स्कूल खुला। मैंने अपने पिता से कहा मुझे ऑफिसर बनना है। मुझे स्कूल भेजो… इसके बाद मेरा दाखिला स्कूल में करवाया गया। हमारे घर में बिजली नहीं हुआ करती थी तो मैं रात में लालटेन जला कर पढ़ा करती।

पढ़ाई के बाद मुझे घर के और खेती के काम भी करने पड़ते थे। इसके बावजूद भी मैं अपनी क्लास में फर्स्ट आती थी। पांचवी कक्षा तक की पढ़ाई करने के बाद मुझे पड़ोस के गांव में 6 किलोमीटर चलकर जाना पड़ता था। ऐसे में मुझे गांव के लोगों से ताने सुनने को मिलते थे। गांव के लोग कहते इतना पढ़ कर क्या करोगी.. ससुराल ही तो जाना है। कोई पढ़ी लिखी बहू नहीं चाहता। बावजूद उसके मैंने लगन से पढ़ाई की और दसवीं में डिक्टेशन हासिल करके आगे पढ़ाई के लिए शहर चली गई। शहर आने के बाद मुझे मालूम चला कि पुलिस में सिपाही की भर्ती निकली है।

मैंने आवेदन किया और परीक्षा में पास करने वाले 50 उम्मीदवारों में मैं इकलौती लड़की थी, लेकिन यह खुशखबरी देने में मैं पिताजी के सामने काफी असहज महसूस कर रही थी, लेकिन जब मैंने उन्हें यह बात बताई तो आश्चर्यजनक बात यह रही कि मेरे पिता ने जवाब में कहा- तेरा ऑफिसर बनने का सपना पूरा होना चाहिए। 9 महीने की कड़ी ट्रेनिंग के बाद में पुलिस महकमे में शामिल हुई। पुलिस महकमे में शामिल होने वाली मैं अपने गांव की पहली महिला थी। उस वक्त मेरी उम्र 19 साल थी और मुझे इस बात की बहुत खुशी थी कि जब मैं अपने गांव पहुंची तो गांव के लोग मुझे सैल्यूट करके कहते पुलिस साहिबा आ गई।

कुछ वक्त बाद मेरे सपनों की उड़ान को किसी की नजर लग गई। कुछ महीने बाद ही मेरे पेट में दर्द होना शुरू हो गया। जांच के बाद डॉक्टर ने मुझे बताया कि मुझे कैंसर है। मैं ओवरियन कैंसर से जूझ रही हूं। जोकी दूसरे स्टेज पर पहुंच गया है। इस दौरान जब मैं अपने सपने को जी रही थी तो यह मेरे लिए अचानक अर्श से फर्श पर गिर जाने जैसा था। इलाज के दौरान शुरुआती 6 महीने बेहद कठिनाई भरे रहे और मेरी कीमोथेरेपी हुई इस दौरान मेरे शरीर के पूरे बाल झड़ गए और वजन महज 35 किलो रह गया। मेरे इलाज पर पिताजी ने 4 लाख रूपये खर्च कर दिए। इस पर पड़ोसियों ने उनसे कहा कि बेटी पर इतने पैसे खर्च क्यों कर रहे हो। मेरे सिर के बाल झड़ गए और कुछ लोग मुझे एक गंजी कहकर भी बुराने लगे। इसलिए मैंने खुद को चार दीवारों में बंद कर लिया।

इलाज के बाद मैंने दोबारा नौकरी शुरू की। मेरे सर पर बाल नहीं थे इसलिए मैं अपने सिर को ढकने के लिए टोपी लगाया करती थी। मैं इस सदमे से उबर नहीं पा रही थी। इस बीच मुझे एक संगीत के टीचर मिले। मैंने मन को शांति देने के लिए हारमोनियम बजाना सिखा। ठीक होने के कुछ महीने बाद में ससुराल आकर अपने पति के साथ रहने लगी। मैंने उन्हें अपने और ओवेरियन कैंसर के बारे में बताया। साथ ही बताया कि मेरे मां बनने की संभावना बेहद कम है, लेकिन उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे सिर्फ तुम्हारा साथ चाहिए। मैं जैसी थी उन्होंने मुझे उसी रूप में स्वीकार कर लिया।

इसके बाद मैंने अपना जीवन समाज सेवा में लगाना शुरू कर दिया। ड्यूटी करने के बाद मैं आसपास के इलाकों में जाती और बच्चों को यौन शोषण और सड़क सुरक्षा के बारे में जागरूक करती। यहां से मेरा नाम पुलिस वाली दीदी पड़ गया। 3 साल में मैंने एक हजार से ज्यादा बच्चों को शिक्षित किया है। मुझे मेरे काम के लिए पुलिस कमिश्नर ने सम्मानित भी किया है। सुनीता यादव ने बताया कि अब मैं बीमारी से भी पूरी तरह ठीक हो चुकी हूं और मेरे बाल भी वापस आ गए हैं। ऐसे में जब मैं अपनी पुरानी तस्वीरें देखती हूं तुम मुझे इस बात का एहसास होता है कि मैं कहां से कहां आ गई हूं और अभी मुझे और कहां जाना है। यह पूरी कहानी सुनीता यादव उर्फ पुलिस वाली दीदी के जीवन संघर्ष की कहानी है, जो महिलाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा स्रोत है।

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