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इटावा ईदगाह के इमाम मौलाना कमालुद्दीन असरफी का इस मामले को लेकर कहना है कि हदीश में कब्रों को जीवित इंसान की तरह ही माना गया है। कब्रिस्तान की व्यवस्था इसलिए बनाई गई है जिससे उन्हें पाक रखा जा सके और उनकी कद्र हो लेकिन हालात के शिकार यहां के फकीर मजहबी पाबंदियां तोड़कर कब्रों के साथ रहने को मजबूर हैं। चकरनगर गांव से जुड़े तकिया मजरा में मुस्लिम आबादी में लगभग 100 फकीरों और 10 परिवार मनुहारों के हैं। जिला प्रशासन द्वारा कई वर्ष पहले ही तहसील के पास ही मनुहारों को कब्रिस्तान की जगह तो दी गई लेकिन वो जातिय संघर्ष की वजह भी बन गई।

मनुहारों इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि, फकीरों को भी यहां शव दफ़न करने दिए जाए। इसका विरोध फ़क़ीर नहीं पाए, जिसके बाद उन्होंने नेताओं से लेकर जिला प्रशासन के अधिकारियों के दफ्तर जाकर अपनी चप्पलें घीस दी लेकिन किसी ने उनकी कभी सुनी नहीं। हां, चुनाव का मौसम आते ही फकीरों को आश्वासन तो मिला लेकिन जमीन नहीं मिली। 70 के दशक में जहां घरों के भीतर ही शव दफ़नाने का सिलसिला शुरू हुआ वो आज भी जारी हैं। घरों में चूल्हों के बगल में ही शव दफ़न हुए हैं।

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