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लॉकडाउन के बाद कामकाज ठप होने से बेरोजगारी की दशा में लोग पैदल ही अपने घरों को चल पड़े जिस वजह से भूख और गर्मी न बर्दाश्त कर पाने से कई श्रमिकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। वहीं गर्भवती महिलाओं को उचित चिकित्सीय देखभाल न मिलने से मृत शिशुओं के पैदा होने की दर में भी इजाफा हुआ है। यह स्थित भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर की है। इन सबको लेकर साइंस जर्नल नेचर ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जो दुनिया भर में लॉकडाउन की अवधि में मृत बच्चों के पैदा होने की घटनाओं के रिसर्च पर आधारित है।

रिपोर्ट में लांसेट के एक शोध का जिक्र किया गया है जिसमें दावा किया जा गया है कि उत्तर भारत के चार अस्पतालों में लॉकडाउन के बाद पैदा हुए बच्चों की मृत दर में इजाफा हुआ है। पहले यह आंकड़ा 2.25 था जो अब बढ़कर 3.15 तक हो गया यानी की मौजूदा दौर में प्रति एक हज़ार पैदा। होने वाले बच्चों में 34 मृत पैदा होने लगे हैं। इसकी वजह यह है कि लॉकडाउन में गर्भवती महिलाएं रूटीन जांच के लिए अस्पताल नहीं पहुंच पाई जिससे न तो उन्हें चिकित्सीय सुविधा उपलब्ध हो पाई और न ही चिकित्सीय सलाह मिल पाई। डॉक्टर्स के कहना है कि लॉकडाउन से पहले यह संख्या 25 थी। लॉकडाउन में बच्चों के मृत पैदा होने को लेकर जोधपुर एम्स के डॉक्टरों से अध्ययन किया जिसमें 25 मार्च से दो जून की अवधि की तुलना 15 जनवरी से 25 मार्च तक के आंकड़ों से की गयी।

लंदन में भी बढ़ी समस्या 

जोधपुर एम्स के डॉक्टरों ने जिन चार अस्पतालों पर अध्ययन किया, उनमें गर्भवती महिलाओं की भर्ती 43.2 फीसदी घटी जो 6,209 से घटकर 3,527 रह गई, जो पिछले साल की तुलना में 49.8 फीसदी कम थी। ओबेस्ट्रिक इमरजेंसी के मामले भी 66.4 कम हुए। सीजेरियन प्रसव 33 फीसदी से बढ़कर 37.03 फीसदी दर्ज किए गए,जबकि अस्पताल में मातृ मृत्यु दर 0.13 फीसदी से बढ़कर 0.20 फीसदी तक पहुंच गई। नेचर रिपोर्ट के मुताबिक लंदन में भी मृत बच्चों के पैदा होने की संख्या में इजाफा हुआ हैं,यहां के सेंट जार्ज हॉस्पिटल में प्रति एक हजार जन्म पर मृत बच्चों की संख्या 2.38 से बढ़कर लॉकडाउन के दौरान 9.31 हो गई। यह करीब चार गुना की बढ़ोतरी है।

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