17

भारत के 12 तटीय शहर करीब 3 फीट पानी में केवल 79 साल में चले जाएंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि जिस तरह से गर्मी बढ़ रही है उसके हिसाब से ध्रुवो पर जमी बर्फ पिघलने वाली है. इस कारण से समुद्री जलस्तर बढ़ जाएगा. फिर क्या… चेन्नई, कोच्चि, भावनगर जैसे शहरों का तटीय इलाका छोटा होने वाला है. इन इलाकों में रहने वाले लोगों को दूसरे स्थान पर जाना होगा. आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं.

सी लेवल प्रोजेक्शन टूल (Sea Level Projection Tool) जो कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने बनाया है. इसका आधार इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) है. इसकी रिपोर्ट में कहा भी गया है कि 2100 तक दुनिया प्रचंड गर्मी को झेलेगी. अगर कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषण नहीं रोका गया तो तापमान में औसत 4.4 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो जाएगी. अगले दो दशकों में ही तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. जब तापमान इतना बढ़ेगा, तो साधारण सी बात है कि ग्लेशियर पिघलने लगेंगे. उसका पानी मैदानी और समुद्री इलाकों में भर कर सब नष्ट कर देगा.

नासा के प्रोजेक्शन टूल में दुनियाभर का नक्शे को उतारकर दिखाया गया है कि किस साल दुनिया के किस हिस्से में कितना समुद्री जलस्तर बढ़ जाएगा. आईपीसीसी हर 5 से 7 साल में दुनियाभर में पर्यावरण की स्थिति की रिपोर्ट देता है. इस बार की रिपोर्ट बहुत भयानक है. यह पहली बार हुआ है जब नासा ने पूरी दुनिया में अगले कुछ दशकों में बढ़ने वाले जलस्तर को मापने का नया टूल का निर्माण किया है. यह टूल दुनिया के उन सभी देशों के समुद्री जलस्तर को माप भी सकता है, जिनके पास तट हैं.

भारत के 12 शहर साल 2100 तक आधा फीट से लेकर करीब पौने तीन फीट समुद्री जल में डूब जाएंगे. क्योंकि तब तक इतनी गर्मी बढ़ जाएगी कि समुद्र का जलस्तर भी बढ़ेगा. सबसे ज्यादा जिन शहरों को खतरा होने की शक है, उसमें- भावनगरः यहां 2100 तक समुद्र का जलस्तर 2.69 फीट ऊपर आएगा, जो कि पिछले साल तक 3.54 इंच ऊपर था. कोच्चिः यहां पर समुद्री पानी 2.32 फीट ऊपर आएगा, जो पिछले साल तक 2.36 इंच ऊपर था. मोरमुगाओः यहां पर समुद्री जलस्तर 2.06 फीट तक बढ़ जाएगा, जो कि पिछले साल तक 1.96 इंच पर था.

फिर जिन शहरों को सबसे ज्यादा खतरा है, उनमें ओखा (1.96 फीट), तूतीकोरीन (1.93 फीट), पारादीप (1.93 फीट), मुंबई (1.90 फीट), ओखा (1.87 फीट), मैंगलोर (1.87 फीट), चेन्नई (1.87 फीट) और विशाखापट्टनम (1.77 फीट) शामिल है. यहां पर पश्चिम बंगाल का किडरोपोर इलाका है जहां बीते साल तक समुद्री जलस्तर के बढ़ने का कोई खतरा महसूस नहीं किया गया. वहां पर भी साल 2100 तक आधा फीट पानी हो जाएगा. जिससे परेशानी होगी. क्योंकि इन सभी तटीय इलाकों में कई स्थानों पर प्रमुख बंदरगाह है. व्यापारिक केंद्र हैं. मछलियों और तेल का कारोबार भी यहीं होता है. समुद्री जलस्तर बढ़ने से आर्थिक व्यवस्था को क्षति पहुंचेगी.

आने वाले दस सालों में इन 12 जगहों पर समुद्री जलस्तर और कितना ऊपर होगा इसका अंदाजा लगाना
मुश्किल है. कांडला, ओखा और मोरमुगाओ में 3.54 इंच, भावनगर में 6.29 इंच, मुंबई 3.14 इंच, कोच्चि में 4.33 इंच, तूतीकोरीन, चेन्नई, पारादीप और मैंगलोर में 2.75 इंच और विशाखापट्टनम में 2.36 इंच. किडरपोर में अगले दस सालो तक तो किसी प्रकार का खतरा नहीं है. लेकिन भविष्य में बढ़ते जलस्तर का से यहां भी नुकसान होगा.

अगले 20 सालों में धरती का तापमान जरूर ही 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ेगा . ऐसा जलवायु परिवर्तन के कारण होगा. एक नई रिपोर्ट में 195 देशों से जुटाए गए मौसम और प्रचंड गर्मी से संबंधित आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है. इतना ही नहीं इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि जो प्रचंड गर्मी (Extreme Heatwave) पहले 50 सालों में एक बार आती थी, अब वो हर दस साल में आ रही है. यह धरती के गर्म होने की शुरुआत है.

एक रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने बताया है कि बीते 40 सालों से गर्मी जितनी तेजी से बढ़ रही है, उतनी गर्मी 1850 के बाद के चार दशकों में अभी नहीं बढ़ी थी. इसी के साथ ही वैज्ञानिकों ने ये चेतावनी भी दी है कि अगर हमनें प्रदूषण पर विराम नहीं लगाया तो प्रचंड गर्मी, बढ़ते तापमान और अनियंत्रित मौसमों का सामना करने के लिए हम तैयार रहें. इस रिपोर्ट के प्रमुख लेखक और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक फ्रेडरिके ओट्टो ने कहा कि जलवायु परिवर्तन भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि अभी की दिक्कत है. यह पूरी दुनिया के हर कोने पर असर डाल रही है. भविष्य में तो और भी भयानक स्थिति बन जाएगी.

फ्रेडरिको ओट्टो ने ये भी कहा कि लगातार तापमान बढ़ने से कैलिफोर्निया, ऑस्ट्रेलिया और तुर्की के जंगलों में लगी आग लगने की घटनाओं में कमी नहीं आने वाली है. इन आग को संभालना मुश्किल होने वाला है. अगर बर्फ खत्म हो जाए और जंगल जल कर खाक हो जाएं तो आपके सामने पानी और हवा दोनों की दिक्कत हो जाएगी. कितने दिन आप इस स्थिति में जीने की उम्मीद कर सकते हैं. ध्रुवों की बर्फ पिघलेगी तो समुद्री जलस्तर बढ़ेगा. कई देश तो यूं ही डूब जाएंगे जो समुद्र के जलस्तर से कुछ ही इंच ऊपर हैं. जंगलों में लगी आग से निकले धुएं के कारण ही उस देश में और आसपास के देशों में लोगों का सांस लेना भी मुश्किल होने वाला है.

दुनिया भर से 4000 करोड़ हर साल टन कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन होता है. यह उत्सर्जन धरती पर मौजूद इंसानों के कारण ही है. अगर इसे हमने 2050 तक घटाकर 500 करोड़ टन पर नहीं लाया तो यह हमारे लिए घातक साबित होने वाला है. लेकिन अगर हम वर्तमान गति से चलते रहे तो साल 2050 तक प्रदूषण, प्रचंड गर्मी, बाढ़ जैसी दिक्कतों का आना दोगुना ज्यादा हो जाएगा. इसे रोकना जरूरी है, नहीं तो अगली पीढ़ियों को एक बर्बाद धरती मिलेगी.

 

इस रिपोर्ट में साफ लिखा है कि पहले 50 सालों कैलिफोर्निया और कनाडा जैसी प्रचंड गर्मी की घटनाएं होती रहती थी. लेकिन अब तो हर दस साल में ऐसी एक घटना देखने को मिलती रहेंगी. चाहे वह कैलिफोर्निया के जंगलों में आग लगने वाली हो, या फिर ऑस्ट्रेलिया में. तुर्की के जंगलों का जल जाना हो या कनाडा के एक पूरे गांव का गर्मी के कारण से भष्म होना. 1900 की कंपैरिजन के बाद से बाढ़ 1.3 गुना अधिक खतरनाक हो चुके हैं. 6.7 गुना ज्यादा पानी का बहाव होता है. मतलब कि अधिक बाढ़.

नासा के एडमिनिस्ट्रेटर बिल नेल्सन ने बताया है कि नासा का यह सी लेवल प्रोजेक्शन टूल दुनियाभर के नेताओं, वैज्ञानिकों को यह बताने के लिए काफी है कि अगली सदी तक हमारे कई देश जमीनी क्षेत्रफल में कम हो जाएंगे. क्योंकि समुद्र का जलस्तर इतनी तेजी से आगे बढ़ेगा, उसे संभाल पाना नामुमकिन होने वाला है. हमें पर्यावरण को ध्यान में रखकर विकास करना होगा. नहीं तो उदाहरण सबके सामने पेश हैं. कई द्वीप डूब चुके हैं, कई अन्य द्वीपों को समुद्र अपने में समा लेगा.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here